हरयाणवी बोली से भाषा तक: पाँच प्रमुख ग्रंथों की प्रकाशन-यात्रा और HARYANVI RAGNI SCHOLARLY DIGITAL CORPUS (HRSDC)
by Anand Kumar Ashodhiya
हरयाणवी को केवल क्षेत्रीय बोलचाल की अभिव्यक्ति के रूप में देखने के बजाय उसके भाषिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक सामर्थ्य को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजित करने की दिशा में पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से एक निरंतर प्रकाशन-प्रयास किया जा रहा है।
इस यात्रा का उद्देश्य किसी एक पुस्तक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हरयाणवी के विभिन्न परस्पर जुड़े हुए पक्षों—शब्द-संपदा, व्याकरण, मुहावरेदार अभिव्यक्ति, भाषिक संरचना, साहित्य और मौखिक परंपरा—को अलग-अलग शोधपरक कार्यों के माध्यम से सामने लाना रहा है।
प्रकाशन-श्रृंखला की चार प्रारंभिक कड़ियाँ
इस क्रम में प्रकाशित प्रमुख कार्य हैं—
1. हरयाणवी: बोली से भाषा तक का भाषाई सामर्थ्य
यह कार्य हरयाणवी की भाषिक क्षमता और उसे भाषा के रूप में देखने की संभावनाओं पर केंद्रित है।
2. हरयाणवी व्याकरण: मानक एवं प्रमाणिक नियमावली
यह ग्रंथ हरयाणवी की व्याकरणिक संरचना और मानकीकरण की आवश्यकता को व्यवस्थित रूप में सामने रखता है।
3. हरयाणवी मुहावरे और लोकोक्तियाँ
यह कार्य हरयाणवी की विशिष्ट मुहावरेदार एवं लोक-अभिव्यक्ति को दस्तावेजित करता है।
4. हरयाणवी शब्दकोश (हरयाणवी–हिन्दी–अंग्रेजी)
यह एक वर्णनात्मक द्विभाषिक/बहुभाषिक कोशीय प्रयास है, जिसका उद्देश्य हरयाणवी शब्द-संपदा को व्यवस्थित संदर्भ के रूप में प्रस्तुत करना और भविष्य के भाषिक एवं कोशविज्ञान संबंधी अनुसंधान के लिए आधार तैयार करना है।
पाँचवीं कड़ी: HRSDC
अब इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण विस्तार के रूप में सामने आया है—
HARYANVI RAGNI SCHOLARLY DIGITAL CORPUS (HRSDC)
Traditional Heritage, Contemporary Voices and Literary English Translations
HRSDC में 73 चयनित हरयाणवी रागनियों, अर्थात HRSDC–0001 से HRSDC–0073, को संकलित किया गया है।
प्रत्येक रागनी को उसके मूल हरयाणवी स्वरूप के साथ प्रस्तुत करते हुए उसके साथ साहित्यिक अंग्रेजी अनुवाद और scholarly interpretation दिया गया है।
रागनियों में दर्शन, अध्यात्म, भक्ति, प्रेम, मानवीय संबंध, सामाजिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति, ग्रामीण जीवन, सांस्कृतिक पहचान, भाषिक अभिव्यक्ति और अन्य विविध जीवनानुभवों के स्वर दिखाई देते हैं।
इस दृष्टि से HRSDC केवल रागनियों का संकलन नहीं है। यह हरयाणवी की मौखिक साहित्यिक परंपरा और उसके भाषिक-सांस्कृतिक स्वरूप का दस्तावेजीकरण करने का प्रयास है।
शब्द से साहित्य तक
यदि इन पाँच कार्यों को एक साथ देखा जाए तो इनके बीच एक स्पष्ट अंतर्संबंध दिखाई देता है।
शब्दकोश हरयाणवी की शब्द-संपदा को दर्ज करता है।
मुहावरे और लोकोक्तियाँ उसकी विशिष्ट लोक-अभिव्यक्ति को सामने लाती हैं।
व्याकरण उसकी संरचना और नियमबद्धता को व्यवस्थित करता है।
“बोली से भाषा तक” उसके व्यापक भाषाई सामर्थ्य पर विचार करता है।
और HRSDC उसकी जीवंत साहित्यिक और मौखिक परंपरा—विशेषतः रागनी—को एक शोधपरक corpus के रूप में प्रस्तुत करता है।
इस प्रकार यह श्रृंखला हरयाणवी के शब्द से लेकर उसके साहित्यिक और ज्ञानपरक संसार तक एक क्रमिक दस्तावेजी यात्रा का रूप लेती है।
हरयाणवी बोली से भाषा तक—और भाषा से साहित्यिक corpus तक।
यही इस प्रकाशन-यात्रा का अगला चरण है।
