“This website is the official literary hub of Anand Kumar Ashodhiya and Avikavani Publishers.” New Hindi Songs, Hindi Geet, Hindi Kavita Authored by Anand Kumar Ashodhiya (Kavi Anand Shahpur). Anand Kumar Ashodhiya is an Indian Author, poet, translator, and retired Indian Air Force Warrant Officer. Writing in Hindi, Haryanvi, and English, he is the founder of Avikavani Publishers. रचयिता : कवि आनन्द शाहपुर (आनन्द कुमार आशोधिया) कॉपीराइट Anand Kumar Ashodhiya©2016-26
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Tuesday, April 28, 2026
हरियाणवी लोक साहित्य के संरक्षण में एक और शैक्षणिक उपलब्धि
Saturday, April 25, 2026
रागणी लेखन में पिंगल का महत्त्व
रागणी लेखन में पिंगल का महत्त्व
छंद की लय में संस्कृति, शब्दों में
संगीत
हरियाणवी रागनी केवल एक लोक–गीत शैली नहीं, बल्कि जन–जीवन की
धड़कन है। यह वह विधा है जिसमें शब्द गाए जाते हैं, भाव मंच पर
जीवित होते हैं, और संस्कृति स्वर बनकर बहती है। परंतु इस पूरी
रचनात्मक प्रक्रिया की एक अदृश्य, किंतु अत्यंत सशक्त नींव होती है—पिंगल शास्त्र।
जब रागनी में पिंगल का समुचित प्रयोग होता है, तब वह केवल कविता नहीं रहती—वह लयबद्ध अनुभव बन जाती है।
पिंगल शास्त्र क्या है?
पिंगल शास्त्र भारतीय छंदशास्त्र की वह प्राचीन विधा है, जो
काव्य–रचना को मात्राओं, लघु–दीर्घ वर्णों, यति–गति और
तुकांत संतुलन के आधार पर संरचित करती है।
यह केवल नियमों का संग्रह नहीं, बल्कि शब्दों की
ध्वनि और समय का विज्ञान है।
संस्कृत और ब्रज काव्य में इसकी गहरी परंपरा रही है, परंतु
लोक–विधाओं—विशेषतः हरियाणवी रागनी—में भी इसकी अनुपालना रचना को
गेय और प्रभावी बनाती है।
पिंगल के मुख्य तकनीकी तत्त्व
1. मात्रा गणना
छंद का आधार मात्रा है।
- लघु
वर्ण = 1 मात्रा
- दीर्घ
वर्ण = 2 मात्राएँ
यह गणना ही तय करती है कि रचना लय में बहेगी या टूटेगी।
2. छंद प्रकार
रागनी में विभिन्न छंदों का प्रयोग होता है:
- चौपाई (16 मात्राएँ)
- रोला (24 मात्राएँ)
- दोहा (13+11)
- कुंडलिया, सवैया, काफिया
आदि
हर छंद की अपनी ध्वनि–लय और भाव–संरचना होती है।
3. यति–गति
- यति = विराम
- गति = प्रवाह
यदि यति गलत हो जाए, तो अर्थ टूटता है;
यदि गति असंतुलित हो, तो गायन असहज हो जाता है।
4. अनुप्रास
(ध्वनि–सौंदर्य)
जैसे:
“कंकण खनके कपोल पे…”
यह ध्वनि–साम्य रचना को श्रवणीय आकर्षण देता है।
5. छंद–बंध
हर पंक्ति, हर चरण, हर मात्रा—एक संतुलन में बंधी
होती है।
यही संतुलन रचना को शास्त्रीय गरिमा प्रदान करता
है।
रागनी में पिंगल की भूमिका
रागनी एक मंचीय कला है—यह पढ़ने से अधिक सुनने और
गाने की विधा है।
इसलिए पिंगल का पालन करने से रचना:
✔ गेय (singable) बनती है
✔ श्रवण में
मधुर लगती है
✔ भाव स्पष्ट
रूप से संप्रेषित होते हैं
✔ प्रस्तुति
प्रभावशाली बनती है
चाहे “किस्सा भगत पूरणमल” का गहन वर्णन हो या वीर रस की गर्जना—
पिंगल ही उसे अनुशासित और प्रभावी बनाता है।
छंद संरचना का उदाहरण (चौपाई)
छंद: चौपाई
मात्राएँ: 16 प्रति पंक्ति
उदाहरण:
साँच कहूँ तो झूठ न मानो |
पूरण भगत की बात पहचानो ||
यहाँ:
- यति
स्पष्ट है
- मात्रा
संतुलित है
- ध्वनि
में लय है
मात्रा–गणना: छंद का प्राण
मात्रा केवल गिनती नहीं—यह ध्वनि का समय है।
मात्रा के प्रकार:
|
प्रकार |
मात्रा |
प्रकृति |
|
लघु |
1 |
ह्रस्व
स्वर |
|
दीर्घ |
2 |
दीर्घ स्वर |
स्वर वर्गीकरण:
लघु (1 मात्रा): अ, इ, उ, ऋ
दीर्घ (2 मात्रा): आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः
उदाहरण:
- क = 1 मात्रा
- की = 2 मात्राएँ
- कं = 2 मात्राएँ
विशेष नियम:
- अनुस्वार/विसर्ग
→ दीर्घ
- संयुक्ताक्षर
→ स्वर के अनुसार
- उच्चारण
→ अंतिम निर्णायक
👉 निष्कर्ष:
मात्रा गणना = सही उच्चारण + अभ्यास
हरियाणवी रागनी लेखन के मूल नियम
1. छंद–संरचना
- मात्रा
संतुलन आवश्यक
- छंद का
शुद्ध प्रयोग
2. तर्ज़ (धुन)
- लोकप्रिय
धुनों पर आधारित हो सकती है
- भाव के
अनुरूप चयन आवश्यक
3. भाषा
- ठेठ
हरियाणवी शब्द
- सरल और
जन–सुलभ शैली
4. भाव–विषय
- स्पष्ट
और केंद्रित
- प्रत्येक
कली में पूर्ण विचार
5. टेक (मुखड़ा)
- रचना की
आत्मा
- बार–बार
दोहराया जाता है
6. तुकांत
- सभी
पंक्तियों में ध्वनि–साम्य
- टेक से
मेल आवश्यक
7. ‘तोड़’ का
महत्व
- हर कली
की अंतिम पंक्ति
- टेक से
तुकांत संबंध
उदाहरण (रोला छंद – 24 मात्राएँ)
तेरै बिन सूना लागै गाम, नैनां में बरसै री झड़ी
तेरी यादां की छाया में, मन में पीड़ा रहै घड़ी
👉 यहाँ:
- 24 मात्राएँ
- संतुलित
यति
- स्पष्ट
तुकांत
रागनी: केवल कला नहीं, साधना है
हरियाणवी रागनी लिखना केवल छंद रचना नहीं—
यह लोक–आत्मा को शब्दों में ढालने की साधना है।
इसमें चाहिए:
- भाव की
गहराई
- लय की
समझ
- छंद का
अनुशासन
साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि
रागनी लेखन का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं—
यह है:
✔ सांस्कृतिक
संरक्षण
✔ सामाजिक
जागरण
✔ लोक–परंपरा
का पुनर्जीवन
पुस्तक का साहित्यिक मिशन
“हीर राँझा-हरयाणवी लोक रागणी संग्रह (पिंगल समीक्षा सहित) हरयाणवी रागणी संग्रह” जैसी कृतियाँ:
- लोक–कथा
को छंद में पुनर्जीवित करती हैं
- पिंगल
के माध्यम से शास्त्रीय आधार देती हैं
- मौखिक
परंपरा को लिखित स्वरूप प्रदान करती हैं
अंतिम संदेश
जब शब्दों में छंद की साँस होती है—
तब कविता जीवित हो उठती है।
जब लय और भाव का संगम होता है—
तब रचना केवल पढ़ी नहीं जाती, गायी जाती है।
और जब पिंगल का अनुशासन जुड़ जाता है—
तब रागनी केवल गीत नहीं रहती,
वह संस्कृति की ध्वनि बन जाती है।
“जहाँ छंद ताल पर थिरकता है —
वहाँ शब्द सिर्फ कहे नहीं जाते, गाये जाते हैं…”

