Sunday, December 28, 2025

अथ मार्जरिका उवाच: भारतीय इतिहास का प्रतीकात्मक महाकाव्य

 अथ मार्जरिका उवाच: भारतीय इतिहास का प्रतीकात्मक महाकाव्य

अथ मार्जरिका उवाच: भारतीय इतिहास का प्रतीकात्मक महाकाव्य

आदिकाल से 2025 तक आर्यावर्त की चिरंतन चेतना

Author: Anand Kumar Ashodhiya
Publisher: Avikavani Publishers
ISBN: 978-93-5619-397-0
Publication Year: 2025

भारतीय साहित्य में बहुत कम कृतियाँ ऐसी होती हैं जो इतिहास, दर्शन और काव्य को एक साथ साधने का साहस करती हैं। “अथ मार्जरिका उवाच”, कवि एवं इतिहास-दृष्टा Anand Kumar Ashodhiya की ऐसी ही एक वृहद महाकाव्यात्मक रचना है, जो आदिकाल से लेकर 2025 तक भारतीय इतिहास का एक प्रतीकात्मक पुनर्पाठ प्रस्तुत करती है।

यह कृति केवल छंदों का संकलन नहीं, बल्कि आर्यावर्त की सामूहिक चेतना का साहित्यिक घोष है—जहाँ सभ्यता का उदय, मध्यकालीन संघर्ष, औपनिवेशिक दासता, स्वतंत्रता संग्राम, विभाजन, लोकतंत्र और आधुनिक भारत एक सतत काव्यात्मक प्रवाह में रूपांतरित होते हैं।

प्रतीकात्मक इतिहास: एक अनूठी साहित्यिक विधा

इस महाकाव्य की सबसे बड़ी विशेषता इसका Symbolic Reinterpretation Framework है। इतिहास की घटनाओं, विचारधाराओं और शक्तियों को 198 विशिष्ट प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है—जैसे श्वेत कपोत, महाबाघ, मौन कपोत, नभ-सारथी
ये प्रतीक किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि युग, विचार और शक्ति-संतुलन को दर्शाते हैं। इससे इतिहास आरोपों से ऊपर उठकर दार्शनिक विमर्श बन जाता है।

सत्य, शोध और साहित्यिक उत्तरदायित्व

Anand Kumar Ashodhiya, पूर्व Warrant Officer, Indian Air Force, इस महाकाव्य में इतिहास के सत्य के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता रखते हैं। सभी घटनाएँ वही हैं जो सार्वजनिक अभिलेखों, संसद और समकालीन विमर्श में दर्ज हैं।
यह कृति न तो राजनीतिक प्रचार है, न ही पक्षपात—यह साहित्यिक साधना और ऐतिहासिक संरक्षण का प्रयास है।

पुस्तक विवरण

  • पुस्तक का नाम: अथ मार्जरिका उवाच

  • विधा: प्रतीकात्मक महाकाव्य

  • ISBN: 978-93-5619-397-0

  • प्रकाशन वर्ष: 2025

  • Author & Publisher: Anand Kumar Ashodhiya

  • Imprint: Avikavani Publishers

  • स्थान: शाहपुर तुर्क, सोनीपत, हरियाणा

“अथ मार्जरिका उवाच” उन पाठकों के लिए है जो इतिहास को केवल घटनाओं की सूची नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की निरंतर यात्रा के रूप में पढ़ना चाहते हैं।

आनंद कुमार अशोदिया एक कवि, अनुवादक और भारतीय वायु सेना के रिटायर्ड वारंट ऑफिसर हैं, जिन्होंने तीन दशकों से ज़्यादा समय तक शानदार सेवा दी है।

अविकावनी पब्लिशर्स के संस्थापक, वह हिंदी, हरियाणवी और अंग्रेजी में लिखते हैं, और लोक परंपराओं, देशभक्ति कविता और नैतिक गीतों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वह अंतर्यात्रा - द इनर जर्नी और कई अन्य मशहूर साहित्यिक कृतियों के लेखक और अनुवादक हैं।

भारत में रहते हुए, वह आधुनिक प्रकाशन और डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए भारत की स्थानीय साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने का काम करते हैं।

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अधराजण: हरियाणवी लोक, इतिहास और महाकाव्यात्मक त्रासदी का पुनर्पाठ

अधराजण: हरियाणवी लोक, इतिहास और महाकाव्यात्मक त्रासदी का पुनर्पाठ

अधराजण: हरियाणवी लोक, इतिहास और महाकाव्यात्मक त्रासदी का पुनर्पाठ


अधराजण: हरियाणवी लोक, इतिहास और महाकाव्यात्मक त्रासदी का पुनर्पाठ

(Adhirājan: A Critical Reading of Haryanvi Folk Epic in Ragni Tradition)

हरियाणवी लोक-साहित्य केवल मौखिक परंपरा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति और नैतिक चेतना का सजीव दस्तावेज होता है। “अधराजण”, कवि आनन्द कुमार आशोधिया (कवि आनन्द शाहपुर) द्वारा रचित, एक साधारण हरियाणवी रागणी संग्रह नहीं है, बल्कि उन्नीसवीं शताब्दी के राजनैतिक, सामाजिक और नैतिक द्वंद्वों का गहन साहित्यिक पुनर्पाठ है।

यह कृति लोक, इतिहास और पिंगल शास्त्र — तीनों को एक साझा मंच पर लाती है।


📜 कथ्य: सत्ता, प्रेम और सामाजिक टकराव

अधराजण का केंद्र जयपुर के महाराजा जगत सिंह और रसकपूर के बीच का संबंध है — जो केवल प्रेम कथा नहीं, बल्कि सामंती सत्ता, वंशवादी शुचिता और स्त्री-चेतना के टकराव की महाकाव्यात्मक त्रासदी है।

रसकपूर का दरबार में प्रवेश उस युग की सामाजिक संरचना को सीधी चुनौती देता है। कवि आनन्द कुमार आशोधिया ने इस संघर्ष को रागणी शैली में अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ रचा है।


📐 छंद-विधान और पिंगल शास्त्र

इस ग्रंथ की सबसे बड़ी शक्ति इसकी छंद-शुद्धता है।
आनन्द कुमार आशोधिया ने लोक परंपरा के मुक्त प्रवाह को पिंगल शास्त्र की कठोर कसौटी पर साधा है।

  • लयात्मकता और अंत-तुकों का अनुशासित प्रयोग

  • हरियाणवी सांग शैली का शास्त्रीय संरक्षण

  • लोक-बिंबों (पनघट, महल, ड्योढ़ी) की गहरी सांस्कृतिक जड़ें

यह रागनियाँ केवल गेय नहीं, बल्कि शोधात्मक साहित्यिक पाठ बन जाती हैं।


⚖️ न्याय, षड्यंत्र और गुरु परंपरा

दरबारी षड्यंत्रों के संदर्भ में गुरु पालेराम का कथन इस कृति को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करता है। यहाँ न्याय की प्रक्रिया स्वयं प्रश्नांकित होती है — जहाँ दोषी छूट जाते हैं और सत्य दंडित होता है।

यह लोक-साहित्य के माध्यम से किया गया एक कालजयी नैतिक प्रतिरोध है।


📚 पुस्तक विवरण (ISBN Authority)

  • पुस्तक का नाम: अधराजण

  • लेखक / कवि: आनन्द कुमार आशोधिया (कवि आनन्द शाहपुर)

  • विधा: हरियाणवी लोक रागणी संग्रह (साँग शैली)

  • ISBN (द्वितीय संस्करण): 978-93-5469-116-4

  • प्रकाशन वर्ष: 2025

  • प्रकाशक: Avikavani Publishers

  • स्वप्रकाशन: Anand Kumar Ashodhiya

  • स्थान: शाहपुर तुर्क, सोनीपत, हरियाणा

ISBN 978-93-5469-116-4 इस कृति को वैश्विक पुस्तक पारिस्थितिकी तंत्र (Global Book Ecosystem) में आधिकारिक पहचान प्रदान करता है।


🖋️ लेखक परिचय

आनन्द कुमार आशोधिया, सेवानिवृत्त भारतीय वायुसेना वारंट ऑफिसर, एक प्रतिष्ठित कवि, अनुवादक और लोक-साहित्य के गंभीर अध्येता हैं।
वे Avikavani Publishers के संस्थापक हैं और हरियाणवी, हिंदी एवं अंग्रेज़ी में 250+ से अधिक रचनाओं के रचयिता हैं।


📌 निष्कर्ष

“अधराजण” हरियाणवी साहित्य में केवल एक लोक-कृति नहीं, बल्कि

  • शोध-साहित्य

  • लोक-इतिहास

  • और नैतिक दर्शन
    तीनों का संगम है।

यह पुस्तक उन पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए अनिवार्य है, जो लोक-साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति और साहित्यिक प्रतिरोध के रूप में देखते हैं।

 

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Saturday, December 27, 2025

Poetry as Social Conscience

Poetry as Social Conscience

Poetry as Social Conscience


Poetry as Social Conscience

In every age, poetry has served as more than an aesthetic pursuit; it has functioned as society’s moral mirror. When institutions fall silent and statistics fail to convey pain, poetry steps forward to speak for the unheard. It becomes, in essence, a form of social conscience.

In the Indian literary tradition, poets have long assumed this responsibility—from Kabir’s fearless questioning of hypocrisy to Dushyant Kumar’s sharp engagement with political disillusionment. Contemporary poetry continues this lineage, not through loud slogans, but through lived experience rendered into lyrical truth.

Socially conscious poetry does not merely protest; it bears witness. It observes hunger not as an abstract condition but as a child’s sleepless night. It views injustice not as a headline but as a lived wound. Such poetry transforms bureaucratic indifference, gendered violence, and social silence into human narratives that demand ethical attention.

The power of this poetry lies in restraint rather than rhetoric. Its language remains grounded, its imagery drawn from everyday life—ration depots, streets, homes, and memories. By anchoring moral concern in the familiar, poetry bridges the gap between empathy and responsibility.

Importantly, poetry as social conscience does not offer easy solutions. It asks uncomfortable questions. It insists on remembrance. It resists normalization of suffering. In doing so, it preserves the human capacity to feel, reflect, and respond.

In an era dominated by speed and spectacle, such poetry reclaims slowness and depth. It reminds us that conscience is not formed through outrage alone, but through sustained moral attention. Poetry, at its truest, becomes not merely an art form—but an ethical act.

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