अंतर्यात्रा Antaryātrā — The Inner Journey: An English Transliteration
इस कृति का भावात्मक और वैचारिक विस्तार अत्यंत व्यापक है। एक ओर जहाँ ‘कारगिल’, ‘शहीद ऊधम सिंह’, ‘परमवीर चक्र’ और ‘स्वतंत्रता’ जैसी कविताएँ राष्ट्रप्रेम को उत्सवी नारों के बजाय अनुशासित कर्तव्य और मौन श्रद्धा के रूप में प्रस्तुत करती हैं, वहीं दूसरी ओर ‘कन्या भ्रूण हत्या’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘गुटखा’, ‘राशन डिपो’ और ‘स्कैंडल’ जैसी रचनाएँ समाज की गहरी विडंबनाओं पर संयमित किंतु तीखी आलोचना करती हैं। यहाँ कवि का स्वर आरोपात्मक नहीं, बल्कि नैतिक साक्ष्य का है।
अंतर्यात्रा की कविताएँ हरियाणा की सांस्कृतिक मिट्टी में गहराई से रची-बसी हैं। लोक मुहावरों, जनभाषा और स्थानीय संवेदना के माध्यम से कवि समय, आस्था, स्मृति और मानवीय दुर्बलताओं पर दार्शनिक प्रश्न उठाता है। ‘बचपन’ जैसी कविताओं में स्मृति और मासूमियत का स्वर सामाजिक परिवर्तन की पीड़ा से जुड़ जाता है, जिससे निजी अनुभव सामूहिक चेतना में रूपांतरित हो जाता है।
अकादमिक समीक्षकों ने इस संग्रह में लेखक के संयमित लहजे, स्पष्ट शब्द-चयन और आत्मनिरीक्षण की विशेष रूप से सराहना की है। आशोधिया की कविताएँ भावुकता में नहीं बहतीं, बल्कि निजी पीड़ा और सामाजिक अनुभव को एक सार्वभौमिक नैतिक संवाद में बदल देती हैं। अंग्रेज़ी अनुवाद मूल भाव को सुरक्षित रखते हुए इस संवाद को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।
समग्रतः, अंतर्यात्रा Antaryātrā — The Inner Journey: An English Transliteration को एक नैतिक इतिहास के रूप में देखा जा सकता है—ऐसा इतिहास जो घटनाओं से नहीं, बल्कि संवेदनाओं, विवेक और आत्मबोध से निर्मित है। यह कृति पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आध्यात्मिक और नैतिक आत्म-परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करती है।

No comments:
Post a Comment