Wednesday, January 28, 2015

दँगा - नया हिन्दी गाना गीत कविता

दँगा - भाग 1

दँगा - नया  हिन्दी गाना गीत कविता

रातों रात जाने क्या हुआ कि शहर भर में दँगा हो गया
जन मानस से ले जनप्रतिनिधि तक हर कोई नंगा हो गया
किसी की किस्मत तो किसी की अस्मत, दाँव पर लग गई
शहर फूँक कर जालिमों की आँख गाँव पर लग गई
शहर दर शहर, गाँव दर गाँव, मौत के कारिन्दे दनदनाने लगे
लालच के भूखे भेड़िये, लाशों पर बैठकर रुपये बनाने लगे
अधकच्ची रोटी और लाश एक ही तंदूर में जल गई
दोनों चीज़ इकट्ठी सेंकने की नयी परम्परा चल गई
लावारिश बचपन, तबाह जवानी, उदासीन खँडहर शहर के प्रतीक हो गए
जिनको पड़े थे लाले रोटी के, वे गरीबी के दो कदम और नज़दीक हो गए

मैं कायर नहीं कि ये सब देखता रहूँ
इतना उदार नहीं कि ये सब सहता रहूँ
खून खौल उठा है मेरा यह मंज़र देखकर
धर्म के नाम पर इंसानियत का खून देखकर
मैंने तुरत फुरत एक साहसी निर्णय ले डाला
बीवी बच्चे, नकदी नामा, एक एक कर सम्भाला
अबेर की न देर की, पहली ट्रेन पकडली
एक नया शहर, एक नया गाँव, एक नयी डगर की सुध ली

राजनीति, उठा-पटक, साम-दाम, दण्ड-भेद
अल्हा-ताला, राम-नाम, श्याम-अली, खेद-खेद
तोहमद-इल्ज़ाम, झंडे-डंडे, साथ-साथ
मिटते रहे, बिकते रहे साबूत हाथों हाथ
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015


दँगा - भाग 2

दँगा - नया  हिन्दी गाना गीत कविता

अमन-चैन लौट आया, लौट आई और एक जाँच
निश्चिन्त हुआ हर एक, साँच को है अब क्या आँच
पूरसूकून मैं भी लौटा अपने शहर बिलकुल अज़नबी की तरह
माकूल नज़र से तौला हर किसी को सच्चे मज़हबी की तरह

रिक्शा वाले से किराया तय ठहराने को ज्यूं ही आगे बढ़ा
देखता हूँ की वो मेरी ही तरफ़ आ रहा है चढ़ा
मैं घबराया, रिक्शा वाला मुस्कराया, हाथ सलाम में उठाये हुए
मैं तो और भी ठिठक गया अपनी पोटली बगल में दबाये हुए
मेरी आँखों में झांकते अजनबीपन ने रिक्शा चालक की मुस्कान छीन ली
तब जाकर मेरे शक्की मन ने चैन की साँस ली
रास्ते भर मैं उचक उचक कर कूचे गली मोहल्लों के निशान तलाशता रहा
रस्ते में ड्यूटी पर तैनात पुलिसियों से रिक्शा चालक की निशानदेही करवाता रहा
मुकाम आने तक अपने मन को खुद ही ढ़ाणढ़स बँधाता रहा
रियर व्यू मिरर में रिक्शा वाले से खुद ही नज़रें चुराता रहा
ना जाने क्यों मुझे रिक्शे वाले की नीयत पर शक हो रहा था
मुझे देख कर उसकी आँखों में जो उभरी थी चमक, उस पर तो और भी शक हो रहा था
या खुदा, हे भगवन किसी तरह नैय्या पार लगादे
इस काल समान रिक्शा चालाक से निज़ात दिलादे
कि तभी रिक्शा रुकी, मैं सहमा सहमा काँप गया
रिक्शा चालक शायद मेरे मन का डर भांप गया
वह बोला भाई साहब आपने मुझे पहचाना नहीं?
भूल गए? मैं रहमत हूँ, क्या अब भी मुझे जाना नहीं
मैं खिसियानी हँसी हँस कर रह गया
फिर से ज़माने की रौ में बह गया

अब मैं फिर से शेर की तरह दनदनाता फिरता हूँ
दँगा तूफ़ान की क्या मजाल किसी से नहीं डरता हूँ
क्या करूँ इन्सान हूँ, अत: फिर से किसी बलवे की बाट जोह रहा हूँ
अपना तमाम सामान बाँधे, सिरहाने रखकर सो रहा हूँ
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015

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श्रीमान मुझे गुटखा कहते हैं - नया हिन्दी गाना गीत कविता

श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!

श्रीमान मुझे गुटखा कहते हैं - नया हिन्दी गाना गीत कविता

हर नुक्कड़ चौराहे पे, पान की दूकान पर,
भिन्न भिन्न आकार में, भिन्न भिन्न प्रकार में,
आपकी सेवा में उपलब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!

आप भी आएं, दूसरों को भी लाएं,
खुद भी खाएं, दूसरों को भी खिलाएं,
क्योंकि सहजता व प्रचुरता में उबलब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!

गले और गाल के कैंसर की गारंटी है
जवानी में ही बुढ़ापे के असर की गारंटी है
धीरे धीरे गुटक लेता हूँ इंसानों की जान, मुझे गुटखा कहते हैं!

खांसी कफ़ के साथ साथ, दांत भी खराब होंगे
शारीरिक कमजोरी के संग, गुर्दे और आंत भी खराब होंगे
मेरे भेजे मुर्दों से तो क्षुब्ध है श्मशान, मुझे गुटखा कहते हैं!

छोटी मोटी विपदा नहीं, साक्षात् काल हूँ मैं,
यम यहाँ, दम वहां, उससे भी विकराल हूँ मैं,
साक्षात् मौत के सामान का प्रारब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!

जीवन पर्यंत आपको कंगाल बनाए रखूँगा,
इस बेशकीमती ज़हर का ग़ुलाम बनाए रखूँगा
आप फिर भी मुझे गुटक रहे हैं, स्तब्ध हूँ श्रीमान, मुझे गुटखा कहते हैं!

रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015
श्रीमान मुझे गुटखा कहते हैं - नया हिन्दी गाना गीत कविता
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राष्ट्रभाषा हिंदी - नया हिन्दी गाना गीत कविता

राष्ट्रभाषा हिंदी

राष्ट्रभाषा हिंदी - नया  हिन्दी गाना गीत कविता

हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा
चंहुमुखी विकास हो हिंदी का, यही देश का नारा

आओ मिलकर प्रण करें, हम राजभाषा अपनाएंगे
मन-वचन और कर्म से हिंदी का मान बढ़ाएंगे
आज़ादी से पहले का गौरव हिंदी को पुन: दिलाएंगे
यही महान है ध्येय हमारा, कहती संविधान की धारा
हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा

बोलचाल की भाषा से उठकर, कार्यालिक भाषा हो हिंदी
हिन्दोस्तां के जन-जन की लेखन भाषा हो हिंदी
सरकारी कार्यालयों में भी, कामकाज़ की भाषा हो हिंदी
सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों की मातृभाषा हो हिंदी
हिन्दीं हैं हम, हिंदी है भाषा, गूंजे राष्ट्र हमारा
हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर, हिंदी का सम्मान हो
समझौता हो, या बैठक हो, हिंदी उसकी जान हो,
हर हिंदी का कर्त्तव्य है, हिंदी का उसे ज्ञान हो
शान हो हिंदी की विश्व में, ऐसा इसका उत्थान हो
गुणगान करे सारा विश्व, और ब्रहमांड में हो जयकारा
हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा, हिंद है देश हमारा

रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015
राष्ट्रभाषा हिंदी - नया  हिन्दी गाना गीत कविता
राष्ट्रभाषा हिंदी - नया  हिन्दी गाना गीत कविता

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