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Tuesday, August 24, 2021

गुस्ताखी माफ़- नया हिन्दी गाना गीत कविता

गुस्ताखी माफ़ 

गुस्ताखी माफ़- नया हिन्दी गाना गीत कविता

मल मल के आँख देखता हूँ, पर भरा पूरा शहर मुझे भाता नहीं है
एक मैं हूँ और एक तूँ है, इसके सिवा कुछ नज़र आता नहीं है

ये माना मेरी जाँ, तूँ सँग में नहीं है
मेरा भी जीवन कुछ उमंग में नहीं है

ये भाव छिपा के रखना, ये दिल भी बचा के रखना,
कहीं खा ना जाए चुगली जुबां , बस होंठ दबा के रखना

याद और अहसास भुलाए नहीं जाते 
ये वो नगमे है जो कभी गाये नहीं जाते 

हसीनों के नाज़ ओ नखरे, फूटी आँख नहीं सुहाते
प्रेयसी के प्रेम वाक्य, मन को ज़रा नहीं भाते 
कोई जाके कहदे उन्हें,

तेरे गालों को छूती ज़ुल्फ़ों से,
तूँ कहे तो ज़रा अटखेलियाँ करलूँ, गुस्ताखी माफ़
तेरी कंचन कामिनी काया को,
तूँ कहे तो ज़रा देर बाँहों में भरलूँ, गुस्ताखी माफ़

जो उठा मन में, विचारों का ताँता
तेरी ही सूरत आ जा रही है
हाल ए दिल तुझको, बताऊँ मै कैसे
यही चिन्ता रात दिन मुझे खाए जा रही है

रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2021



Saturday, August 21, 2021

दँगा भाग 2 - नया हिन्दी गाना गीत कविता

दँगा भाग 2

दँगा भाग 2 - नया  हिन्दी गाना गीत कविता

अमन-चैन लौट आया, लौट आई और एक जाँच
निश्चिन्त हुआ हर एक, साँच को है अब क्या आँच
पूरसूकून मैं भी लौटा अपने शहर बिलकुल अज़नबी की तरह
माकूल नज़र से तौला हर किसी को सच्चे मज़हबी की तरह

रिक्शा वाले से किराया तय ठहराने को ज्यूं ही आगे बढ़ा
देखता हूँ की वो मेरी ही तरफ़ आ रहा है चढ़ा
मैं घबराया, रिक्शा वाला मुस्कराया, हाथ सलाम में उठाये हुए
मैं तो और भी ठिठक गया अपनी पोटली बगल में दबाये हुए
मेरी आँखों में झांकते अजनबीपन ने रिक्शा चालक की मुस्कान छीन ली
तब जाकर मेरे शक्की मन ने चैन की साँस ली
रास्ते भर मैं उचक उचक कर कूचे गली मोहल्लों के निशान तलाशता रहा
रस्ते में ड्यूटी पर तैनात पुलिसियों से रिक्शा चालक की निशानदेही करवाता रहा
मुकाम आने तक अपने मन को खुद ही ढ़ाणढ़स बँधाता रहा
रियर व्यू मिरर में रिक्शा वाले से खुद ही नज़रें चुराता रहा
ना जाने क्यों मुझे रिक्शे वाले की नीयत पर शक हो रहा था
मुझे देख कर उसकी आँखों में जो उभरी थी चमक, उस पर तो और भी शक हो रहा था
या खुदा, हे भगवन किसी तरह नैय्या पार लगादे
इस काल समान रिक्शा चालाक से निज़ात दिलादे
कि तभी रिक्शा रुकी, मैं सहमा सहमा काँप गया
रिक्शा चालक शायद मेरे मन का डर भांप गया
वह बोला भाई साहब आपने मुझे पहचाना नहीं?
भूल गए? मैं रहमत हूँ, क्या अब भी मुझे जाना नहीं
मैं खिसियानी हँसी हँस कर रह गया
फिर से ज़माने की रौ में बह गया

अब मैं फिर से शेर की तरह दनदनाता फिरता हूँ
दँगा तूफ़ान की क्या मजाल किसी से नहीं डरता हूँ
क्या करूँ इन्सान हूँ, अत: फिर से किसी बलवे की बाट जोह रहा हूँ
अपना तमाम सामान बाँधे, सिरहाने रखकर सो रहा हूँ

रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015